लवथवती विक्राळा ब्रम्हांडी माळा शंकराची आरती संस्कृत आरती

आरती
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श्री शंकरस्य आरतिः 

(मूल मराठी- लवथवती विक्राळा)

जय देव जय देव शिवशंकर जय हे |

त्वाम् कर्पूरसुगौरम् वयम् आर्ताः स्तुमहे || धृ. ||

                       || जय देव जय देव ||

लम्बन्ते विकराला ब्रह्माण्डे मालाः

विषेण कण्ठः श्यामो विलोचनात् ज्वालाः |

जह्नोर्लावण्ययुता शिरसि धृता बाला

जलप्रवाहो मन्दम् वहति यति विमलः || १||

                       || जय देव जय देव ||

मुग्धो विशालनयनः कर्पूरसुगौरः

अर्धांगिनी च गिरिजा गलेऽस्ति सुमहारः |

उद्धूलनं विभूतेर्नीलः शितिकण्ठः

एवम् विलसति शंकर एष उमादयितः || २||

                       || जय देव जय देव ||

कृतं सुरासुरवृन्दैरम्भोधेर्मथनम्

हालाहलम् च सहसा तस्माद् उद्भूतम् |

सहसा त्वम् च सलीलम् कृतवान् विषपानम्

ततो नीलकण्ठ इति त्वन्नाम प्रथितम् || ३||

                       || जय देव जय देव ||

व्याघ्राम्बरः फणिधरः सुन्दर- मदनारिः

पंचाननो मनोहर ऋषिजन- सुखकारी |

शतकोटी- जपबीजे रामनाम्नि रमते

रघुकुलतिलको रामो रामदास- चित्ते || ४||

                       || जय देव जय देव ||

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