सार्थ सुभाषित संस्कृत मराठी sarth subhashit sanskrit

सार्थ सुभाषित संग्रह

१) 🌸 सुभाषित 🌸

इंद्रियाणां तु सर्वेषां यद्येकं क्षरतींद्रियम् |
तेनास्य क्षरति प्रज्ञा दृते: पादादिवोदकम् ||

अर्थ :- पखालीला एक छिद्र पडलें तरी त्यांतून जसें हळूहळू सर्व पाणी निघून जातें , तसें इंद्रियांतून एक इंद्रिय जरी विषयासक्त झाले तरी त्या द्वारें हळूहळू मनुष्याची बुद्धि नष्ट होते.

संग्रह: धनंजय महाराज मोरे🙏

2) 🌸 सुभाषित 🌸

शक्यो वारयितुं जलेन हुतभुक् छत्रेण सूर्यातपो
नागेन्द्रो निशताङ्कुशेन समदो दण्डेन गोगर्दभौ।
व्याधिर्भेषजसंग्रहैश्च विविधैर्मन्त्रप्रयोगैर्विषम्
सर्वस्यौषधमस्ति शास्त्रविहितं मूर्खस्य नास्त्यौषधम्।।

आग को पानी से बुझाया जा सकता है,
सूर्य की तीव्र धूप को छाते से रोका जा सकता है,
मतवाले हाथी को तीक्ष्ण अङ्कुश से वश में किया जा सकता है।
सांड और गधे को डंडे से रोका जा सकता है,
भयंकर रोग को दवाओं से दूर किया जा सकता है,
तथा विष अनेन प्रकार के मंत्रों के प्रयोग से उतारा जा सकता है।
इस प्रकार संसार में सब की दवा शास्त्रों में विहित है,
*किंतु मूर्ख को उचित मार्ग पर लाने के लिए अथवा उसकी मूर्खता दूर करने के लिए कोई दवा नहीं है।*

*Today’s Thought:*
The boldness
to think is easy,
to act is hard,
but the hardest thing in the world is
to act in accordance with ur thinking.
try it once & see the difference.

संग्रह: धनंजय महाराज मोरे🙏

3) 🌸 सुभाषित 🌸

वॄत्तं यत्नेन संरक्ष्येद् वित्तमेति च याति च।
अक्षीणो वित्तत: क्षीणो वॄत्ततस्तु हतो हत:॥

We should guard our character attentively; money can come and go. If money is lost, nothing is lost but if character is lost, everything is lost.

चरित्र की प्रयत्न पूर्वक रक्षा करनी चाहिए, धन तो आता-जाता रहता है। धन के नष्ट हो जाने से व्यक्ति नष्ट नहीं होता पर चरित्र के नष्ट हो जाने से वह मरे हुए के समान है।

संग्रह: धनंजय महाराज मोरे🙏

४ ) 🌸 सुभाषित 🌸
*अक्रोधेन जयेत् क्रोधम् असाधुं साधुनां जयेत् । जयेत् कदर्थ दानेन जयेत् सत्येन चानृतम् ॥*
   क्रोधावर शांतीने विजय मिळवता येतो, दुर्जनावर सदाचाराने, कृपनावर दानाने व असत्यावर सत्याने विजय प्राप्त करता येतो.
संग्रह: धनंजय महाराज मोरे🙏
५) 🌸 सुभाषित 🌸
त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं पुत्राश्च दाराश्च सहृज्जनाश्च।
तमर्थवन्तं पुनराश्रयन्ति अर्थो हि लोके मनुष्यस्य बन्धुः॥
मित्र, मुले, पत्नी आणि सगळे सगे सोयरे निर्धन व्यक्तीला सोडून जातात. त्याच्याकडे धन-संपत्ती येऊ लागताच हे सर्व दूर गेलेले लोक पुनश्च जवळ येतात. एकूण काय, तर या दुनियेत पैसा हाच मनुष्याचा खरा मित्र असतो.
संग्रह: धनंजय महाराज मोरे🙏

🌸 सुभाषित 🌸

उत्साह-उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम् । सोत्साहस्य हि लोकेषु न किञ्चदपि दुर्लभम् ॥
 भावार्थ :
उत्साह बड़ा बलवान होता है; उत्साह से बढ़कर कोई बल नहीं है । उत्साही पुरुष के लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं है ।
संग्रह: धनंजय महाराज मोरे🙏

 

कीर्तनकार, प्रवचनकार, भागवतकार, समाज प्रबोधनकार, एंड्रॉयड डेव्हलपर, ईबुक मेकर,

Leave a Reply

*

fourteen + sixteen =